सभी लौगौ कॊ मेरा
Discussion about Education, Preparation of Govt.Jobs, Politics etc.
I am a teacher. I want to help you in Current topics like Education, Politics, Civil Services etc.
बुधवार, 25 अगस्त 2021
रविवार, 29 नवंबर 2020
Sacche Deshbhakto ki kahani
“नवम गुरु का तेज ही पीढ़ी दर पीढ़ी जा सकता है
कोई भगीरथ ही धरती पर गंगा को ला सकता है,
वे जो चारों जवाँ शेर दशमेश पिता के जाए थे,
वे इस धरती को कुछ दिन सम्मान सिखाने आए थे,
मस्तक पर था स्वाभिमान नव-पौरूष भी बलिदानी था,
जिनकी नवल आयु के आगे युग-युग पानी पानी था,
याद रखेंगे बाबा ज़ोरावर फ़तह की पावन गाथा,
इंच इंच चिन गए मगर ना झुकने दिया हिंद का माथा,
वो अज़ीत बाबा जुझारू चमकौर गढ़ी पर वारे हैं,
चारों साहिबज़ादे दुनिया की आँखों के तारे हैं...!”🙏
🙏 ❤️इतिहास का विद्यार्थी होने के नाते व संत-परम्परा के प्रति अपरिमित आदर होने के कारण, पूज्य बाबा गुरू नानक देव जी के अमृत संदेशों को गहरे तक जानने, जीने का अवसर लगातार मिला और इसी परम्परा के अवगाहन के एक सिरे पर खड़े शस्त्र और शास्त्र के समान साधक दशमेश पिता गुरु गोविंद सिंह जी को भी प्रणाम करने का अवसर मिला ! बड़ा मन था कि कभी न कभी बाबा नानक देव जी व उनसे चलकर दशमेश पिता गुरू गोविंद सिंह धार्मिक-कट्टरपंथियों व परदेस में बैठे राष्ट्रवाद के घोर दुश्मन ISI पोषित उनके खालिस्तानी पिट्ठुओं ने जिस तरह वर्चुअल गाली-गलौज की है व धमकियाँ दी हैं, मेरा अपयश फैलाया है, मेरे प्रति घृणा बोयी है तब से इन पुण्य अवसरों तक पर कुछ भी लिखते-पढ़ते बहुत संकोच सा होता है कि पता नहीं मेरी किस भोली श्रद्धा को ये पाक पालित पिस्सू अपने एजेंडा के लिए घृणा फैलाने के अवसर में बदल लें ? फ़ालतू में क्यूँ एक नए विवाद को जन्म दूँ ? दुख इस बात का भी होता है कि मेरी सोच को अंदर तक जानने वाले अन्य सिख बंधु भी इनके ऐसे एजेंडा युक्त दुष्प्रचार और गाली-गलौज पर डरकर या संकोच से चुप्पी साध जाते हैं !
अस्तु पूरे संसार को शांति, सद्भाव, मानवता और भाईचारे का युग-कल्याणकारी संदेश देने वाले संत गुरु नानक देव जी की जयन्ती की हार्दिक शुभकामनाएं! गुरपुरब के शुभ अवसर पर आज उल्लास और उत्सवों के बीच थोड़ा समय निकाल कर उन परम सन्त की जीवनी और उनके उपदेशों को भी ज़रूर पढ़ें। यक़ीन मानिए आज का दिन समाप्त होने तक आप एक बेहतर मनुष्य हो चुके होंगे। 🙏🏻
'वाहेगुरु जी दा खालसा, श्री वाहेगुरु जी दी फ़तेह'
स्वयं-मूल्यांकन पर हिंदी कहानी
*ड्राईवर*
स्वयं-मूल्यांकन पर हिंदी कहानी
रामू एक बहुत ईमानदार और मेहनती युवक था। वह बहुत हंसमुख और मधुर स्वाभाव का व्यक्ति था। एक दिन रामू एक किराने की दुकान पर गया।
वहां सिक्का डालने वाला सार्वजनिक फ़ोन लगा था। रामू ने सिक्का डाला और एक नम्बर डायल किया।
ट्रिंग-ट्रिंग..ट्रिंग-ट्रिंग…. किसी ने फ़ोन उठाया।
रामू बोला, “ हेलो सर… नमस्ते, मैंने सुना था कि आपको एक ड्राईवर की आवश्यकता है। मैं भी एक ड्राईवर हूँ। क्या आप मुझे अपने यहाँ ड्राईवर की नौकरी देंगे ?”
व्यक्ति ने कहा “ बेटा, मेरे यहाँ पहले से ही एक ड्राईवर है। मुझे अन्य किसी ड्राईवर की आवश्यकता नहीं है।
रामू ने कहा “ सर, मैं एक अच्छा ड्राईवर होने के साथ- साथ एक ईमानदार इंसान भी हूँ। आपके यहाँ जो ड्राईवर है, मैं उससे भी कम तनख्वाह काम करने को तैयार हूँ।
“ बेटा, जो ड्राईवर मेरे यहाँ काम करता है, मैं उसके काम से खुश हूँ। बात पैसों की नहीं है, हम जैसा ड्राईवर चाहते हैं, वैसा हमारे पास हैं और हमें किसी अन्य ड्राईवर की जरूरत नहीं है।”, व्यक्ति ने समझाया।
रामू ने जोर देकर कहा, “ सर, मैं आपके यहाँ ड्राईवर का काम करने के साथ- साथ अन्य काम भी करूँगा, जैसे- बाज़ार से सब्जी लाना, आपके बच्चों को स्कूल छोड़कर आना, इत्यादि। मैं आपको यकीन दिलाता हूँ कि मैं आपको किसी भी शिकायत का मौका नहीं दूंगा। मुझे उम्मीद है कि अब आप मुझे मना नहीं करोगे।”
व्यक्ति बोला “ कहा न मुझे अभी किसी ड्राईवर की जरूरत नहीं है!” और ऐसा कहकर उसने फ़ोन काट दिया।
दुकानदार रामू की बात बहुत ध्यान से सुन रहा था। उसने रामू से कहा “मेरा बेटा शहर में रहता है। उसे एक अच्छे ड्राईवर की जरूरत है। अगर तुम कहो तो मैं तुम्हे नौकरी दिलवा सकता हूँ।”
रामू ने दुकानदार से कहा, “ आपके सहयोग के लिए धन्यवाद ! पर मुझे नौकरी की कोई आवश्यता नहीं है।”
दुकानदार हैरानी से बोला “ लेकिन अभी तो तुम फ़ोन पर नौकरी पाने के लिए गिडगिडा रहे थे। अब क्या हुआ ? अब जब मैं तुम्हे घर बैठे ही नौकरी दिलवा रहा हूँ तो तुम मुझे नखरे दिखा रहे हो..भलाई का ज़माना ही नहीं रहा!”
रामू ने बड़ी विनम्रता के साथ कहा, “ आप मुझे गलत न समझिएगा। मुझे काम की कोई जरूरत नहीं है। दरअसल सच बात तो यह है कि, मैं अपने ही काम की परीक्षा ले रहा था। उस व्यक्ति के यहाँ काम करने वाला ड्राईवर और कोई नहीं, वो मैं ही हूँ।
दोस्तो, सफल जीवन जीने के लिए यह अत्यंत आवश्यक है, कि हम स्वयं को अच्छी तरह जाने। हम अपनी कमजोरियों और कमियों को पहचाने और जितनी जल्दी हो सके उन कमियों पर विजय प्राप्त करें।
यहाँ यह बात समझनी जरूरी है की कोई भी व्यक्ति हमें उतना बेहतर नहीं समझ सकता जितना कि हम खुद को समझ सकते है। स्वमूल्यांकन/self-evaluation एक ऐसी ही महत्वपूर्ण प्रक्रिया है, जिसके द्वारा हम स्वयं ही स्वयं की परीक्षा लेते हैं, और अपनी कमजोरियों या कमियों को जानने की कोशिश करते हैं। इसमें व्यक्ति को पूरी ईमानदारी के साथ खुद से पूछना चाहिए कि-
➡मैं जो काम कर रहा हूँ, क्या मैं उसे पूरी ईमानदारी के साथ कर रहा हूँ?
➡क्या मैं अपने काम में, अपना 100% योगदान दे रहा हूँ?
➡क्या मैं अपने काम को और बेहतर तरह से कर सकता हूँ?
➡क्या मैं अपनी कंपनी के लिए और उपयोगी साबित हो सकता हूँ?
➡इस स्वमूल्यांकन (self-evaluation) के द्वारा हम न केवल अपनी Professional life बेहतर बना सकते हैं, बल्कि जीवन के प्रत्येक क्षेत्र (Professional , Personal and Social life ) में अपनी सफलता सुनिश्चित कर सकते हैं।
तो, आइये आज से, अभी से इस अत्यंत महत्वपूर्ण और उपयोगी कला को अपने जीवन का अभिन्न अंग बनायें, और पूरी ईमानदारी के साथ इसे अपने जीवन में अपनाकर अपनी सफलता सुनिश्चित करें
शनिवार, 7 नवंबर 2020
!! संयम का महत्व !
!
संयम बड़़ा ही गूढ़ शब्द है अगर जीवन मे सफलता पानी है तो इसका साथ नही छोरना होगा । कइ बार असफलता का कारन सयम खोना होता है ।
कहने को तो संयम बहुत ही छोटा सा शब्द है पर समझने को बहुत ही बड़ा है। आज मैं आपको एक छोटी सी घटना का उल्लेख कर रहा हूँ, जो समझ गया, समझो जीवन का गूढ़ रहस्य समझ गया और जो न समझ सका उसे ईश्वर ही सदबुद्धि दें।
एक देवरानी और जेठानी में किसी बात पर जोरदार बहस हुई और दोनों में बात इतनी बढ़ गई कि दोनों ने एक दूसरे का मुँह तक न देखने की कसम खा ली और अपने-अपने कमरे में जा कर दरवाजा बंद कर लिया। परंतु थोड़ी देर बाद जेठानी के कमरे के दरवाजे पर खट-खट हुई। जेठानी तनिक ऊँची आवाज में बोली कौन है, बाहर से आवाज आई दीदी मैं! जेठानी ने जोर से दरवाजा खोला और बोली अभी तो बड़ी कसमें खा कर गई थी। अब यहाँ क्यों आई हो ?
देवरानी ने कहा दीदी सोच कर तो वही गई थी, परंतु माँ की कही एक बात याद आ गई कि जब कभी किसी से कुछ कहा सुनी हो जाए तो उसकी अच्छाइयों को याद करो और मैंने भी वही किया और मुझे आपका दिया हुआ प्यार ही प्यार याद आया और मैं आपके लिए चाय ले कर आ गई।
बस फिर क्या था दोनों रोते रोते, एक दूसरे के गले लग गईं और साथ बैठ कर चाय पीने लगीं। जीवन में क्रोध को क्रोध से नहीं जीता जा सकता, बोध से जीता जा सकता है। अग्नि अग्नि से नहीं बुझती जल से बुझती है।
शिक्षा:-
समझदार व्यक्ति बड़ी से बड़ी बिगड़ती स्थितियों को दो शब्द प्रेम के बोलकर संभाल लेते हैं। हर स्थिति में संयम और बड़ा दिल रखना ही श्रेष्ठ है।
शनिवार, 24 अक्टूबर 2020
आपसी एकता की बाधाए -एक कहानी
एक बार की बात है एक गधा पेड़ से बंधा था।
शैतान आया और उसे खोल गया।
गधा मस्त होकर खेतों की ओर भाग निकला और खड़ी फसल को खराब करने लगा।
किसान की पत्नी ने यह देखा तो गुस्से में गधे को मार डाला।
गधे की लाश देखकर गधे के मालिक को बहुत गुस्सा आया और उसने किसान की पत्नी को गोली मार दी।
किसान पत्नी की मौत से इतना गुस्से में आ गया कि उसने गधे के मालिक को गोली मार दी।
गधे के मालिक की पत्नी ने जब पति की मौत की खबर सुनी तो गुस्से में बेटों को किसान का घर जलाने का आदेश दिया।
बेटे शाम में गए और मां का आदेश खुशी-खुशी पूरा कर आए। उन्होंने मान लिया कि किसान भी घर के साथ जल गया होगा।
लेकिन ऐसा नहीं हुआ। किसान वापस आया और उसने गधे के मालिक की पत्नी और बेटों, तीनों की हत्या कर दी।
इसके बाद उसे पछतावा हुआ और उसने शैतान से पूछा कि यह सब नहीं होना चाहिए था। ऐसा क्यों हुआ?
शैतान ने कहा, 'मैंने कुछ नहीं किया। मैंने सिर्फ गधा खोला लेकिन तुम सबने रिऐक्ट किया, ओवर रिऐक्ट किया और अपने अंदर के शैतान को बाहर आने दिया। इसलिए अगली बार किसी का जवाब देने, प्रतिक्रिया देने, किसी से बदला लेने से पहले एक लम्हे के लिए रुकना और सोचना ज़रूर।'
ध्यान रखें। कई बार शैतान हमारे बीच सिर्फ गधा छोड़ता है और बाकी विनाश हम खुद कर देते हैं !!
और हाँ, आपको ये भी समझना है कि गधा कौन हैं?
हर रोज टीवी चैनल गधे छोड़ जाते हैं,
कोई ग्रुप में गधा छोड़ देता है।
दोस्तों के ग्रुप में और पार्टी बाजी या विचारधारा के चक्कर में आप और हम लड़ते रहते हैं।
मिल जुल कर मुस्कुरा कर खुशी से रहिये
याद रखें-
तोड़ना आसान है जुड़े रहना बहुत मुश्किल है,
लड़ाना आसान है मिलाना बहुत मुश्किल .l.
एक बार की बात है एक साहूकार के चार बेटे थे। जब जमींदार बूढ़ा हो गया तो उसने उन्हें बुलाया और समझाया कि एक बन के रहोगे तो कोई तुम्हें बिजनेस में नही हरा पायेगा। वे सब इसे समझ नहीं पाये । वे सब आपस में लड़ते रहते और अपना नुकसान करते।
एक दिन साहूकार ने उन्हें अपने पास बुलाया और सबको एक एक लकड़ी का टुकड़ा दिया और उसे तोड़ने के लिए कहा। सबने आराम से इसे तोड़ दिया।
पुनः साहूकार ने चार लकड़ियों को एक साथ तोड़ने के लिए कहा अब कोई इसे तोड़ नहीं पाया।तब साहूकार ने समझाते हुए आपसी सहयोग की ताकत बताई।
सकारात्मक सोच एक कहानी
🔆 इंसान अपने विचारों से निर्मित प्राणी है, वो जैसा सोचता है वैसा बन जाता है.
एक राजा के पास कई हाथी थे लेकिन एक हाथी बहुत शक्तिशाली था, बहुत आज्ञाकारी, समझदार व युद्ध-कौशल में निपुण था, बहुत से युद्धों में वह भेजा गया था और वह राजा को विजय दिलाकर वापस लौटा था। इसलिए वह महाराज का सबसे प्रिय हाथी था।
समय गुजरता गया ...
और एक समय ऐसा भी आया, जब वह वृद्ध दिखने लगा।
अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर पाता था।
इसलिए अब राजा उसे युद्ध क्षेत्र में भी नहीं भेजते थे।
एक दिन वह सरोवर में जल पीने के लिए गया, लेकिन वहीं कीचड़ में उसका पैर धँस गया और फिर धँसता ही चला गया।
उस हाथी ने बहुत कोशिश की,
लेकिन वह उस कीचड़ से स्वयं को नहीं निकाल पाया।
उसकी चिंघाड़ने की आवाज से लोगों को यह पता चल गया कि वह हाथी संकट में है।
हाथी के फँसने का समाचार राजा तक भी पहुँचा।
राजा समेत सभी लोग हाथी के आसपास इक्कठा हो गए और विभिन्न प्रकार के शारीरिक प्रयत्न उसे निकालने के लिए करने लगे।
लेकिन बहुत देर तक प्रयास करने के उपरांत कोई मार्ग नही निकला
तभी गौतम बुद्ध मार्गभ्रमण कर रहे थे। राजा और सारा मंत्रीमंडल तथागत गौतम बुद्ध के पास गये और अनुरोध किया कि आप हमे इस बिकट परिस्थिति मे मार्गदर्शन करे.
गौतम बुद्ध ने सबके घटनास्थल का निरीक्षण किया और फिर राजा को सुझाव दिया कि सरोवर के चारों और युद्ध के नगाड़े बजाए जाएँ।
सुनने वालो को विचित्र लगा कि भला नगाड़े बजाने से वह फँसा हुआ हाथी बाहर कैसे निकलेगा। जैसे ही युद्ध के नगाड़े बजने प्रारंभ हुए, वैसे ही उस मृतप्राय हाथी के हाव-भाव में परिवर्तन आने लगा।
पहले तो वह धीरे-धीरे करके खड़ा हुआ और फिर सबको हतप्रभ करते हुए स्वयं ही कीचड़ से बाहर निकल आया।
गौतम बुद्ध ने सबको स्पष्ट किया कि हाथी की शारीरिक क्षमता में कमी नहीं थी, आवश्यकता मात्र उसके अंदर उत्साह के संचार करने की थी।
"जीवन में उत्साह बनाए रखने के लिए आवश्यक है कि मनुष्य सकारात्मक चिंतन बनाए रखे और निराशा को हावी न होने दें।
" कभी – कभी निरंतर मिलने वाली असफलताओं से व्यक्ति यह मान लेता है कि अब वह पहले की तरह कार्य नहीं कर सकता, लेकिन यह पूर्ण सच नहीं है
"सकारात्मक सोच ही आदमी को "आदमी" बनाती है...
और उसे अपनी मंजिल तक ले जाती है.. !!
रविवार, 18 अक्टूबर 2020
जाति औरत की
आज दुनिया कहॉ पहुंच चुकी है पर हम भारतवसी जाति और धर्म की पुछ पकड़े हुए है । जिसका सबसे ज्यादा फायदा राजनीतिक दलो ने उठाया है । क्या आपलोगो को नही लगता की अब जागने का समय आ गया है । क्या आज शिक्षा पर केवल ब्राह्मण जाति का अधिकार है, सेना मे केवल क्षत्रिय है या व्यपार पर बनियो का अधिकार है । देखने से तो ऎसा नही लगता ।
जाति क्या है इस पर एक महिला के विचार ।
एक आदमी ने महिला से पूछा......
तम्हारी जाति क्या है?
महिला ने उल्टा ही पूछ लिया...
एक मां की या एक महिला की
उसने कहा....चलो दोनों की बता दो.....
और चेहरे पर हल्की सी मुस्कान बिखेरी।
महिला ने भी पूरे धैर्य से बताया
एक महिला जब माँ बनती है, तो वो जाति-विहीन हो जाती है,
उसने फिर आश्चर्य चकित होकर पूछा....
वो कैसे..?
जबाब मिला कि .....
जब एक माँ अपने बच्चे का लालन पालन करती है,अपने बच्चे की गंदगी साफ करती है,
तो वो शूद्र हो जाती है......
वो ही बच्चा जब बड़ा होता है तो माँ नकारात्मक ताकतों से उसकी रक्षा करती है,
तो वो क्षत्रिय हो जाती है
जब बच्चा और बड़ा होता है,
तो माँ उसे शिक्षित करती है,
तब वो ब्राह्मण हो जाती हैऔर अंत में,
जब बच्चा और बड़ा होता है तो माँ उसके आय और व्यय में उसका उचित मार्गदर्शन कर अपना वैश्य धर्म निभाती है
तो अब बताओ कि...... हुई ना एक महिला या मां जाति विहीन
उत्तर सुनकर वो अवाक् रह गया।
उसकी आँखों में महिलाओं या माताओं के लिए सम्मान व आदर का भाव था,
और उधर उस महिला को अपने माँ और महिला होने पर पर गर्व का अनुभव हो रहा था।. संसार की सभी महिलाओं को समर्पित🙏🏻
प्रिय बन्धुओ
आपके लिये एक कविता जो मा को समर्पीत है
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
सिंह की सवार बनकर
रंगों की फुहार बनकर
पुष्पों की बहार बनकर
सुहागन का श्रंगार बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
खुशियाँ अपार बनकर
रिश्तों में प्यार बनकर
बच्चों का दुलार बनकर
समाज में संस्कार बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
रसोई में प्रसाद बनकर
व्यापार में लाभ बनकर
घर में आशीर्वाद बनकर
मुँह मांगी मुराद बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
संसार में उजाला बनकर
अमृत रस का प्याला बनकर
पारिजात की माला बनकर
भूखों का निवाला बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी बनकर
चंद्रघंटा, कूष्माण्डा बनकर
स्कंदमाता, कात्यायनी बनकर
कालरात्रि, महागौरी बनकर
माता सिद्धिदात्री बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओ
तुम्हारे आने से नव-निधियां
स्वयं ही चली आएंगी
तुम्हारी दास बनकर
तुम्हारा स्वागत है माँ तुम आओl
🌹जय माता दी 🌹 जय माता दी 🌹
🙏🙏🙏🙏 🙏🙏🙏🙏
मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020
भारतीय फिल्मीस्तान सच्चाई या दिखावा
प्रिय बन्धुओ
भारतीय फ़िल्मिदुनिया चकाचॊध से भरी हुई हॆ । हम इनकी वास्त्वीकता के बारे मे कम ही जानते हॆ । हम जैसा फिल्मो मे और समाचार पत्रो मे देखते और सुनते हॆ वैसी छवी बना लेते हॆ । कुछ तो हमारे आदर्श बन जाते हॆ और हम उनकी पुजा तक करने लग जाते हॆ। कई कलाकार हॆ जो फिल्मो मे खलनायक का किरदार निभाते हॆ लेकिन वास्तव मे वे काफी सरल स्वभाव के हॆ ।
फिल्मे समाज की पसन्द के आधार पर बनती हॆ कि समाज देखना क्या चाहता हॆ ? 1950 से 1990 के दसक तक जो फिल्मे बनी उनमे अधिकान्श देशभक्ति और एस्मगलिङ्ग [ सोना, हीरा, ड्र्ग्स ] से जुड़ी थी । इससे हमे शिक्षा भी मिलती थी। इनमे भारतीय परम्पराओ, रिति रिवाजॊ का पुरा ध्यान रखा जाता था ।
सन २००० के बाद रोमानटीक फिल्मो का दौर शुरु हुआ। ये सिलसिला 2010 तक चला । यहा तक तो ठीक था उसके बाद जो अश्लीलता का दौर शुरु हुआ वह आज तक जारी हॆ।
खॆर मेरा उद्देश्य इस समय किसी और बात पर चर्चा को लेकर हॆ वह हॆ इन कलाकरो का सामाजिक दायित्व। आज सभी कलाकार अच्छी खासी कमाई कर रहे हॆ क्या उनका दायित्व नही बनता की समाज की कुछ जिम्मेदारिया निभाये। जो पैसा उनको समाज से मिल रहा है उसक कुछ अन्श समाज पर खर्च करे।
चाहे वह हिन्दु कलाकार हो या मुसलमान, कोई इस फ़र्ज को निभाने के लिये तैयार नही है। फिल्मो मे आप गरिबो की मदद करके वाहवाहि बटोरते है, कही पोलिस बनकर तो कही वकील बनकर।
यह सच कि आज हर व्यक्ति अपनी सुख सुविधाओ और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिये कमाता है किन्तु यह सही नही होगा कि अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज की भलाई के लिये खर्च करे। अरे जिनके पास है वे तो दे ही सकते है।
यह भी सच है कि पैसे कि भूख मरते दम तक मिट्ने वाली नही है जैसे अमबानी की भूख।
हमारे कलाकार जो पैसे गलत शॊको [ ड्रग्स] को पुरा करने के लिये खर्च करते है उसको तो समाज कि भलाई के लिये लगा ही सकते है। क्योकि आज उनकी वास्तविकता हमारे सामने है। समाजसुधारक दिखने वाले ये लोग अन्दर से कितने खोखले है। कितनी बुराईयो को इन्होने पाल रखा है।
रविवार, 11 अक्टूबर 2020
घर पर शिक्षा कैसे हो यह हमारी जिममेदारी
गुरुवार, 8 अक्टूबर 2020
झगरालु होत मानव समाज
क्या कारण है कि मानव विक्षिप्त हो रहा है। आज सभी उनके जीवन से जुड़ी समस्याओं का सामना कर रहे हैं। कुछ लोगों को पैसे की समस्या है और कुछ को स्वास्थ्य संबंधी समस्या है। अगर आप हमारे आसपास देखते है, कोई खुश नहीं दिखेगा।
खुशी क्या है ? दु: ख का अंत हो गया या कुछ कम हो गया। इसके बारे में कोई नहीं जानता। महात्मा बुद्ध ने कहा कि दुनिया दुखों से भरी है और हम इसे हरा सकते हैं केवल अच्छे आचरण से । मानव असीमित इच्छाओं के साथ जन्म लेता है। और पूरे जीवन उन्हें पूरा करने की कोशिश की।
दुःख का कारण हमारी अधूरी इच्छा है जो कभी पूरी नहीं हो सकती। जब एक इच्छा पूरी होती है, तो दूसरा हमारे सामने खड़ा होता है। इसलिए हमें इस अंधी दौड़ को छोड़ना होगा।
हर देश और हर व्यक्ति इस असीम दौड़ में भाग ले रहा है और इस दौड़ को जीतना चाहता है। लेकिन यह संभव नहीं है । हमें वास्तविक खुशी की खोज करने की कोशिश करनी चाहिए। हमें अपनी इच्छाओं को नियंत्रित करने का प्रयास करना चाहिए। तब हमें वास्तविकता के बारे में पता चलेगा।
मॆॆ कोइ निराशावादी नही हू बल्कि चाह्ता हू कि हम सभी विकास की दौड मे जिन चीजो को भुलते जा रहे हे जैसे अपने संसकार, रिस्ते-नाते, परिवार आदि बहुत कुछ। परिवार और रिश्ते नाते कच्चे धागे की तरह हॆ जो एक बार टूटने के बाद जुर नही पाते ा हमे इिन्हे बचाना होगा ा
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सभी लौगौ कॊ मेरा
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“नवम गुरु का तेज ही पीढ़ी दर पीढ़ी जा सकता है कोई भगीरथ ही धरती पर गंगा को ला सकता है, वे जो चारों जवाँ शेर दशमेश पिता के जाए थे, वे इस ...
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We all know that children is our future. It is our duty to create them according to the present condition. Maximum people does not know ho...
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In every election, our leaders try to motivate people on the basis of caste and religion. It is not their fault but we are responsible for t...







