मंगलवार, 13 अक्टूबर 2020

भारतीय फिल्मीस्तान सच्चाई या दिखावा

प्रिय बन्धुओ 

भारतीय फ़िल्मिदुनिया चकाचॊध से भरी हुई हॆ । हम इनकी वास्त्वीकता के बारे मे कम ही जानते हॆ । हम जैसा फिल्मो मे और समाचार पत्रो मे देखते और सुनते हॆ वैसी छवी बना लेते हॆ । कुछ तो हमारे आदर्श बन जाते हॆ और हम उनकी पुजा तक करने लग जाते हॆ। कई कलाकार हॆ जो फिल्मो मे खलनायक का किरदार निभाते हॆ लेकिन वास्तव मे वे काफी सरल स्वभाव के हॆ ।





फिल्मे समाज की पसन्द के आधार पर बनती हॆ कि समाज देखना क्या चाहता हॆ ? 1950 से 1990 के दसक तक जो फिल्मे बनी उनमे अधिकान्श देशभक्ति और एस्मगलिङ्ग [ सोना, हीरा, ड्र्ग्स ] से जुड़ी थी । इससे हमे शिक्षा भी मिलती थी। इनमे भारतीय परम्पराओ, रिति रिवाजॊ का पुरा ध्यान रखा जाता था ।

सन २००० के बाद रोमानटीक फिल्मो का दौर शुरु हुआ। ये सिलसिला 2010 तक चला । यहा तक तो  ठीक था उसके बाद जो अश्लीलता का दौर शुरु हुआ वह आज तक जारी हॆ।





खॆर मेरा उद्देश्य इस समय किसी और बात पर चर्चा को लेकर हॆ वह हॆ इन कलाकरो का सामाजिक दायित्व। आज सभी कलाकार अच्छी खासी कमाई कर रहे हॆ क्या उनका दायित्व नही बनता की समाज की कुछ जिम्मेदारिया निभाये। जो पैसा उनको समाज से मिल रहा है उसक कुछ अन्श समाज पर खर्च करे।

चाहे वह हिन्दु कलाकार हो या मुसलमान, कोई इस फ़र्ज को निभाने के लिये तैयार नही है। फिल्मो मे आप गरिबो की मदद करके वाहवाहि बटोरते है, कही पोलिस बनकर तो कही वकील बनकर।





यह सच कि आज हर व्यक्ति अपनी सुख सुविधाओ और भविष्य को सुरक्षित रखने के लिये कमाता है किन्तु यह सही नही होगा कि अपनी कमाई का कुछ हिस्सा समाज की भलाई के लिये खर्च करे। अरे जिनके पास है वे तो दे ही सकते है।

यह भी सच है कि पैसे कि भूख मरते दम तक मिट्ने वाली नही है जैसे अमबानी की भूख। 

हमारे कलाकार जो पैसे गलत शॊको [ ड्रग्स] को पुरा करने के लिये खर्च करते है उसको तो समाज कि भलाई के लिये लगा ही सकते है। क्योकि आज उनकी वास्तविकता  हमारे सामने है। समाजसुधारक दिखने वाले ये लोग अन्दर से कितने खोखले है। कितनी बुराईयो को इन्होने पाल रखा है। 


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